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Suraj Kumar Goel

Suraj Kumar Goel

छोटे बड़े शहरों के अख़बारों में क्या छपता,

घर पर आते अखबार भी बुजुर्ग सा लगता।

 

सरकारें अफरा तफरी में, दफ्तर बड़ा बेहाल रहता,

देश विदेश तू तू मैं मैं, जनता ये अख़बार पढता।

 

देश का बनिया लूट चवन्नी परदेश में जा छिपता,

मरती है बदहाल किसानी और भारत का लाल मरता।

 

होती राज गुंडों की वो पन्नो में छप जाता,

नेताजी के कर्मो का मसाला भी तीखा लगता।

 

अब तो ग़ालिब परेशान मन यही है कहता,

अख़बार में न्याय छोड़ सब कुछ है छापता।