• HOME
  • BLOG DETAIL
Suraj Kumar Goel

Suraj Kumar Goel

ना जाने कितने जलवे है तेरे बारिश,

कभी आशिकी, कभी बेवफाई तो कभी बचपन का साथ लगती ये बारिश।

 

वो थी अपनी बचपन और हमारी ख्वाहिश,

कागज की कश्ती बना, करता था उसकी नुमाईश।

कीचड़ पर तेरे कदमो निशां था चलना,

वो गुजरा बचपन और वो गुजरी बारिश।

 

चलते चलते आई जवानी, उमड़ पड़ी फिर अपनी ख्वाहिश,

संग भींग चल मेरे, करता तुझसे गुजारिश।

यूँ सीने से लगा कर हो जाऊं मैं मदहोश,

आज सावन के झूलों में बैठा हुआ है बारिश।

 

पहले छप छप से आती थी बारिश,

बिन छाते के नहलाती थी बारिश।

अब दफ्तर के खिड़की से झांकती,

हँस कर मुझपर, जोरो से चिढ़ाती है बारिश।

 

ये रिमझिम बुँदे करता हजारों साजिश,

ना आए तो सूखा, ज्यादा आए तो सुनामी है बारिश।

याद ना रख पाऊं तेरे रंग रूप हजार,

बस दीवारों पे नाम तेरे लिख दूँ बारिश।