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Suraj Kumar Goel

Suraj Kumar Goel

बड़ी है नशीली दिसंबर की धूप,

कुछ है लजीली दिसंबर की धूप।

तेरी छत से मेरी छत तक,

छनकर छितराती है दिसंबर की धूप।

 

छूना चाहूँ पर छू ना पाऊं,

बाँधू तो बांध ना पाऊं,

चन्दन सी महकती दिसंबर की धूप,

"सूरज" की अंगड़ाई है दिसंबर की धूप।