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Suraj Kumar Goel

Suraj Kumar Goel

मैं खामोश हूँ, ये ख़ामोशी का राज़ मुझे नहीं मालूम,
ना जाने क्यों वो मुझे मगरूर समझ बैठे हैं।

ख़ामोशी में जो मजा है वो कहाँ इजहार में,
शब्द-शब्द को चुनता हूँ वक़्त के पैमाने में।

पर मेरे अल्फ़ाज़ का हर शब्द तेरा गुलाम है,
मेरे हर नफ़्ज़ में बस तेरा नाम है।

कुछ सवाल और उनके जवाब कभी नही सुना था मैंने,
तुम जो उतर गयी थी नजरों में, फिर कोई और नही चुना था मैंने।

जिंदगी के सफर में यूँ तो कोई ठिकाना न था,
दिन और रातें बीती है इंतजार में तेरे ,
हाँ मै हूँ इंतजार में तेरे...हाँ मैं खामोश हूँ...