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Suraj Kumar Goel

Suraj Kumar Goel

वो ज़िद भी मेरी अजीब थी,
एक बारिश की ज़िद थी,
मैंने बादल से यारी कर ली।

 

मंजिल की तलाश में मैं मुसाफ़िर,
चल पड़ा एक अनजान सफर की ओर,
गुमनाम चाहत की हसरत थी,
वो ज़िद भी अजीब थी।

 

मिल जाए आसानी से तो ये ज़िद कैसी है,
है ख़्वाहिशें हजार, ये ज़िद कैसी है,
पर ज़िद तो है उसकी जो मुकद्दर में है ही नहीं,
वो ज़िद भी अजीब थी, ये ज़िद भी अजीब है।