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Suraj Kumar Goel

Suraj Kumar Goel

रह गई अधूरी कविता मेरी,

उलझनों में खो गए शब्द कहीं।

 

नए शब्द की तलाश में,

कागज को यूँ तो देखा नहीं।

 

यादों को पन्नों में ढूँढता चला,

मानो निशाने पे है कोई तीर कहीं।

 

परछाई को हमसफ़र बना के चला,

देखो अल्फ़ाज़ मेरे अब वो दूर नहीं।