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Suraj Kumar Goel

Suraj Kumar Goel

मेरा जनम ब्लैक डायमंड सिटी  धनबाद, झारखंड मे हुआ । कोयले का शहर है धनबाद । यानी की मेरा बचपन कोयले के बीच बीता । कोयला मेरे बचपन का खिलौना था ।

बचपन के  दिनो मे घर में कोयला प्लॉस्टिक के छोटे से बोरे में आता था। एक चूल्हा हुआ करता था लोहे और मिट्टी का बना हुआ, जिसमें लकड़ी और कोयला डालकर हवा करने पर आग जलती थी। कोयला गोल नहीं होता था। उसका मुंह हम लोगों जैसा ही था। टेढ़ा-मेढ़ा बिना किसी आकार का।

रात में जलते लाल कोयले पर रोटियां फूल जाया करती थीं। रोटी का वह स्वाद हीटर और गैस पर बनी रोटियों में कभी नहीं आया। सर्द रातों में ये चूल्हा बड़ा काम आता गर्माहट के लिए।

बोरे में कोयला टकराकर चूरा बन जाता था। मां उस चूरे में भूसी मिलाकर एक पेस्ट जैसा कुछ बनाती और फिर उस पेस्ट से पकौड़े जैसी चीज बनती थी। उन काले पकौड़ों को धूप में सुखाकर फिर से कोयले की तरह इस्तेमाल किया जाता था।

कोयले का कण-कण काम आता था। कोयले की कालिख से हम डरते भी नहीं थे, क्योंकि वह कालिख हमारे काले बदन पर दिखती नहीं थी।

आज यही कोयले का नाम भ्रष्टाचार और घोटाले से जूडा है । पांच सितारा होटलों में बड़े-बड़े सम्मेलनों में कोयले का नाम कोल हो गया है और इस पर राजनीतिक की रोटी सेकी जाती है । आज कोयला बदनाम हो रहा है । आज कोयले पे करोड़ो रुपए के घोटाले हो रहे है ।
अब तो दिल रो कर यही कहता हे कि, कोयला बदनाम हुआ, नेताजी तेरे लिए